शनिवार, 16 जुलाई 2011

लेखक- श्री मन्नू लाल ठाकुर


ददरिया -

मोर करिया करोंदा लाली हावे रंग ।
चल-चल जाबांे मड़ई संगे-संग ।।
1 नवा तरिया के पानी दिखत हे फरिहर, तंय घठांेदा मा आबे, बधे हो नरिहर  ।।
तोर तरिया के पानी मतलहा होगे गा, तोर मति हरागे पगलाहा हावस गा  ।

2 बिहनिया के पानी संझनिया के घाम, गोधना गोधाबे लिखाबे मोरेच नाम  ।।
        निठल्ला ते घुमथस कुछु नइये काम, मदरसा मा चल दे लिखा ले नाम  ।।

3 बादर मा उड़त हे मन परेवा बन के, आवत हे सुरता उड़त हे मन के  ।।
गिधाव हा घुमत हे बैरी बन के, सबो घुसड़ जही तोर सपना मन के  ।।

4 रक्सहुं के पानी मारत हे झिपार, अगोरहुं तोला संगी तरिया के पार  ।।

        सावन के महीना बादर हा गरजय, बुद्धु हावस तय सियान हा बरजय  ।।


5 बेनी हा लहरावे नागिन जस वो, महमहावत हे नोनी चंपा जस ओ  ।।
        तोर बोली लागे जंगल के फटहा बंास, ढंेला पथरा चलत हे चटक जाही कंास  ।।

6 पांवे मा पैजन अउ खोपा मा कोकवा, तोर रुप हा बरत हे, होगे हो भोकवा  ।।
पहिरे हस जिंस टेटका सही लागत हस, तोर गुन मा आगी लागे खुदे बफलत हस  ।।

7 लुगा के अंछरा ला उडावत हे पवना तंय खोचे हावस नोनी कानंे मा दवना  ।।
रंग हावे बिलवा, तोर नाक हावे छेपका, पुच-पुच कुदत हावस तरिया कस मेचका  ।।

8 पपीहा हा गावे बिजरावत हावे ओ, चेहरा मा लाली सरमावत हावे ओ  ।।
कउंवा कस नरियाथस कान हा पिरागे, हावस ते ढ़ोड़मा अकल हा सिरागे  ।।

9 नाके मा फुली अउ आंखी मा कजरा, चढ़ती हावे बेरा तोपत हे बदरा  ।।
तोर नाक हा बोहावे अंाखी मा चिपरा, दंतला हावस तय पीठ हावय कूबरा  ।।

10 तोर लिच-लिच कनिया डोलत हावय ओ, नाचत हे मयुरी, मैना बोलत हावय ओ  ।।
ते हथ्थी सही पेटला शोभत नइये गा, पतरेंगवा हावे गोड़ बोहत नइयेगा  ।।

11 आवत हे गरेरा सरसरावत हावे ओ, थाम ले मोर हाथ ला गोहरावत हावो ओ  ।।
नाके ला उंच करके गोहरावत हावस गा, झुमत हे घूनघूटी चकरावत हावस गा  ।।

12 फुरफुंदी कस नोनी ते उड़त हावस ओ, डेना-डेना पिराही ते भूलत हावस ओ  ।।
कुवंा के मेचका टूरा कुवंाच मा रहिथे, ते हावस ढोगिया मोर मन कहिथे  ।।

13 बिजल असन नोनी बिछल जथस ओ, मोंगरी असन नोनी सलंद जतस ओ  ।।
ढुटी के मछरी ढुठीच मा रहिथे गा, बुचके मछरी मरवा असन रहिथे गा  ।।

14 तय बदबनी हावस टुरी बाते ल बढातस, मुठा भर भाजी और खूबेच बघारतस  ।।
रेंदियाहा हावस टुरा पाछु-पाछु आतस, शरम नी लागे तोला मिरची लगातस  ।।

15 बेर हा दरगे बूड़े ला जावत हे, मोटियारी हावस टुरी मन हा बहकगे  ।।
चकवी ला देख के चकवा चिचयाय, तोर उमर पहागे झन लार टपकाय  ।।

16 आमा के बगीचा मा खूबेच फरे आमा, रद्दा रेंगइया हा नोनी मारहीच लबेदा  ।।
नजर हा जतर कतर नाचत हावे गा, रद्दा मा दर्रा भोरका हपट जाबे गा  ।।

17 डोमी असन नोनी फूफकारत हावस ओ, संपेरा के बिन मा ते नाचत रबे ओ  ।।
सपेरा के झंपली नानुक हावे गा डोमी हा गरजही ते रोवत रहिबे गा   ।।

18 चंुदी ला छितरा के मटकावत हावस ओ, जकही भुतही असन दिखत हावस ओ  ।।
काकरो सिंगार तोला सहत नइये गा, तोर आंखी के टंेटरा बरत नइये गा  ।।

19 कपड़ा के तंगी तोला होगे हावे का ओ, मोर संगे मा चल समराहुं तोला का ओ  ।।
शेखी अब्बड़ मारथस दरपन ला देख बेेन्दरा असन दिखथस चंेहरा ला देख  ।।

20 लाल-लाल लिपस्टिक होठ मा रचाय, कोन ला चूहके हस नोनी  मोला ते बताय  ।।
गेड़रा तोर बाढ़े हे रेड़वा सही दिखत हस, लफर-लफर मारथस फाफा कस दिखत हस  ।।

21 कोन हा मरगे नोनी ते हाय हाय करतस, बोवाय फ्रंदला देख के आहें ते भरतस  ।।
निचट गंवार अउ जंगली ते लागत हस, आज के एटीकेटे थोरको नी जानत हस  ।।

22 अपन दाई ददा ममी डैडी पुकारत हस, जीते जी उहंला मुरदा तंे बुलावत हस  ।।
कुंवा के मेचका देश विदेश ला नी जानत हस, मगज मा भुसा भरे फेसन ला नी जानत हस  ।।

23 एक बार कहि दे कसम में खावत हो चंदा मा घर बसाबोन गजरा में लावत हो  ।।
घूमें बर लेगस नहीे डींग ते मारत हस, कइसे खसम बनबे कसम खुब खावत हस  ।।

24 तोड़ के लाहुं चंदा चंादनी हाथ मा मड़ाहंु तोर सात समुंदर पार मन ला बहलाहूं तोर  ।।
साग भाजी सिल्होय बर तोला ओत लागथे जांगर तोर चलय नहीं शरम मोला लागथे  ।।

25 बनाहुं नवा बंगला मालकिन तेहा रबे ओ, आलीसान कार मा तेहा घुमे ला जाबंे ओ  ं।।
कार बंगला के सपना ते देखावत हवस सगा रंेटही साइकिल मा ते घुमत हावस गा  ।।

26 मयारु के ममता और मन के अंजोर, सुनावत हो ददरिया निकल जबे खोर  ।।

सपना के राजा अउ मन के मितान सुनत हो ददरिया छेड़ देबे तान  ।।




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पोरा के बिहान दिन
19 नवम्बर 2008

तिजा लेय बर आहुं नोनी, मैं हा पोरा के बिहान दिन  ।।
मइके के सुरता आवत होही, होगे तोला गजब दिन  ।
महतारी के मया अलगे होथे, सुरता तोला आवत होही  ।।
मन बैरी हा मानय नही, अंासु हा नी थमावत हाई  ।
पारा परोस मा खेलस तेहा, छुटपन के सुरता आवत होही  ।।
फुगड़ी अउ छुवउला खेलस, संगवारी मन के सुरता आवत होही  ।
ककी भौजाई के नत्ता मन हा नोनी कहि बुलावत रिहिन  ।।
खोर गली हा सुन्ना होगे दाई बहिनी सब रोहत रिहिन  ।
हंासत हंासत तेहा आबे नोनी, रोवत-रोवत झन जाबे ओ  ।।
तोर बिन जग अंधियार होगे, हमला हंसा-हंसा के जाबे ओ  ।
खुरमी ठेठरी लाहुं तोर बा, सुवाद लगा के बने खाबे ओ  ।।
मया के कलेवा मीठ लागते, झोला भर मया धर के आबे ओ  ।
घाट घठोंदा मा भेंट होही तिजहारिन मन हा सकलाही ओ  ।।
गंाव के नदिया गंगा बन जाही, पावन इसनान कराही ओ  ।
फंुलकसिया लोटा मा पानी भर के निकासी मा झाकत होही  ।ं।
खुरुर खारर थोरको सुनके, मुहाटी मा दउड़े आवत होही  ।
मनपंछी बन के उड़त होही मइके मा मड़रावत होही  ।।
दाई ददा हा नजर मा झूलके, आंखी हा तो फड़कत होही  ।


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गंाव के सुरता
19 नवम्बर 2008
गांवे के अब्बड़ सूरता आथे, निकले होगे गजब दिन  ।
तिहार बर में हा घर आंहु देव दशहारा के आगु दिन  ।।
दाई ददा ला पंाव पलेगी, भइया भउजी ला परनाम  ।
लुरु-बुटंु मन ला चुमाचाटी, सबो भाई मन ला राम-राम  ।।
पानी बादर बने गिरत होही, खेती किसानी बने चलत होही  ।
सरग भरोसा हमर खेती हावे, निंदई बियासी होगीस होही  ।।
बारी बखरी मा जरी पंटवा, चेंचभाजी अउ रमकलिया  ।
तोरई बरबटी और सेमीनार, डोड़का करेला और चुचूटिया  ।।
मेड़ पार मा पतेरा डोहंडू फूटंु, परिया ढोगरी के चरोटा भाजी  ।
सोंद सोंद मा खुबेच खवाथे, सूरता आथे गंाव के कांदा भाजी  ।।
हरेली तिहार के चीला कलेवा, नुनवा गूरहा दुनो सुहावे  ।
बंास के बनावे गेढ़ी सवारी, लइका चेलिक सबोला भावे  ।।
आठे बर आवे किसन कन्हैया, आनी बानी के बनते पकवान  ।
नाग पंचमी मा नागिन पुजा, अखाड़ा मा लड़े पहलवान  ।।
झरझर झरझर पानी गिरे, पोरा मा हावय दही बोरा  ं।
पोरा जाता के करथे पुजा, मनाइन पोरा हेरिन मोरा  ।।
गियारा दिन रहे गनपति, नाचा गम्मत खुब होवे  ।
पन्द्रा दिन मा आवे पीतर, घरोघर बरा सोहारी पोवे  ।।
नौ दिन बिराजे दुर्गा माता, शीतला मंदीर मा जग जंवारा  ।
कला मंच मा होवे रामलीला, अंत में रावन के वारा न्यारा  ।।
सूरोती के अब्बढ सूरता आथे, जगमगावे घर अउ खोर गली  ।
बरात निकलथे गौरी गौरा के, संग मा चले देवी महाबली  ।।
देवारी बर खिचरी खवाथे, सोहई बंधावे गउ माता मन  ।
दोहा पढ़य अउ नाचय गावय, हरसित होवय तन अउ मन  ।।
आवे फगवा रंग गुलाल के, तन बदन ला नहलाथे गा  ।
परसा फूल रंग बगरावय, होली मिलन के सुरथा आथे गा  ।।
गंाव के अब्बड़ सुरता आथे, निकले होगे गजब दिन  ।

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चना रखवार
22 नवम्बर 2008
फागुन महीना के संजहा बेरा, लहुटत रहिस अपन घर मा  ।
चिरइ मन चिचयावत रहय, रद्दा तीर के बुढ़वा पीपर मा  ।।
रथिया के रथ ला आवत देख के, तमतमावत रहय प्रतापी बेर हा  ।
मुंहु कान ललियावत रहय, ओधा मा मुंह लुकावे बंेर हा  ।।
मेडहा रद्दा मा रेगत रहिस, नजर पड़िस चना खेत मा  ।
लइका मन कहिथे होरा खाबो, सोचत उतरिस चना खेत मा  ।।
देख के दूमुठा चना उखानिस, मोटयाइस गमछा के छोर मा  ।
शुरु कुरु घर मा पहंुचिस, चना ला टंागीस परवा कोर मा   ।।
रथिया बियारी करके डोकरा, ढलगिस अपन जठना मा  ।
जरहा मास के बदबु आइस, डोकरा अकबका के जठना मा  ।।
तोर बाप ददा कमा के भरे हे, उखान के लाने हस चना ला  ।
तोर भोभस ला तेह भरम हस, फौरन अमरा दे चना ला  ।।
कमरा खुमरी ला ओढ़े रिहिस, हाथ मा दिखिस गोटंानी बंास  ।
जुगुर जुगुर अंाखी करय, डोकरा के होगे उपर संास  ।
उसनिंदा में ओकर रात पहागे, उठिस डोकरा कुकरा बासत  ।
चना उठा के उठीस घर ले, छाती धड़कय निकलिस संासत  ।।
ठेंगा ठठावत डोकरा चलय, रददा छोड़य कीरा मकोरा  ।
भुतहा खेत के चना उखनई, अइसन होथे सउंख चना होरा के  ।।



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मछरी चोर 
22 नवम्बर 2008

उतरत हे उतेरा के पानी, अकल लगाइस चतुरा किसान  ।
मोघा मा ढूढो बेंदूंवा खेलिस,मछरी उतरही मन मा जान  ।।
बड़े बिहनिया गिस झारे बर, चरिहा टुकना रखिस साथ  ।
कउंवा कोकड़ा उड़त राहय, देखिस दशा ठनक गे माथ  ।।
कोई चतुरा चतुराई करिस, झारिस बेंदुवा स्वंागंे मछरी  ।
चोरी करिस होगे नौ दो गियारा, घींव पीयत हे ओढ़ के कथरी  ।।
पहिदे गाय एक दिन पछाड़े जाय, दुसर दिन चोर आबे करही  ।
बेंदुवा तीर मा खेलिस फंादा, चोरी करही जरुर हबरही  ।।
दुसर बिहनिया गिस भोरबर, देखिस दशा खुब हंसी आवे  ।
बंेदुवा मा मछरी फंादा चोर, सरम के मारे सर ना उठावे  ।।
गोहार सुन लोगन दउड़े आइन, तमासा देखिन सब मछरी चोर  ।
बंाधा के ओला गंाव मा लाइन, खूटा मा बंाधिन मंइदे खोर  ।।
जो भी आवे मारे कोटेला एक, पूरा बस्ती अजमावय हाथ  ।
मछरी चोरी हा मंहगा पड़गे, सोच सोच के धुनत हे माथ  ।।
चेलिक जवान कोटेला मारे, पढइया लइका करे गिनती  ।
मछरी चोर होगे भारी संकट मा, मनेमन प्रभु ला करे विनति  ।।
बिहनिया ले संजहा बेरा तक, खूब खाइस कोटेला के मार  ।
पानी पुछइया कोनो नइये, सबोच बरसावय दुदु चार  ।।
रथिया खोर गली सुन्ना परगे, सोवा परगे पूरा बसती मा  ।
हुंवा सुनके लगिस हुंवास, हुंवावे सबो कोलिहा मसती मा  ।।


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करनी के फल
23नवम्बर 2008

कउवा उंट मा रहिस दोस्ती, दुनो एके खेत मा चारा चरंय  ।
खार खेत मा खुब घुमंे फिरय, मन भर खाय अउ पेट अघाय  ।।
एक दिन आइस कपटी कोलिहा, मुंह मा ओकर पानी चुचवाय  ।
कोलिहा के नियत रिहिस खराब, उंट कउंवा मा मतभंेद कराय  ।।
कोलिहा उंट ला करिस सलामी, मीठ-मीठ बोली बतरावे कोलिहा  ।
कउंवा होगे गांव के जोगड़ी जोगी, आन गंाव के सिदध बनगें कोलिहा ।।
परबुघिया उंट ला कोलिहा भावें, संगंे संग मा दोनो किजरें फिरें  ।
कउवंा ला होइस भारी चिन्ता, कोलिहा कपटी अउ अधम गिरे  ।।
दुनों के पाछू ला कभूच नी छोड़य, कोलिहा हावय भारी लबरा  ।।
उंट हावय निचट सुधवा बपुरा, कोलिहा हावय मुंह मीठ, दिल कबरा  ।।
उंट कोलिहा गिन बउटरा खेत, कोलिहा करिस साजिश प्रबल  ।
कोलिहा बोले भरगे पेट हुवंासी लागे, बुद्धु उंट करें बल बल बल बल  ।।
टेनपा धर के आगे रखवार, चतुरा कोलिहा लुकावे ओधा पार  ।
केलिहा होइस भारी गदगद, परबुधिया सहे टेनपा के मार  ।।
पल्ला दौड़िस उंट बेचारा, हफरत हफरत जान बचाय  ।
उंट ला अब समझ मा आगे दुष्ट कोलिहा साजिस रचाय  ।।
बुद्धु उंट अब करीस चतुराई, चलो मीत जाबो नदिया ओपार  ।
नदिया देख कोलिहा के पोटा कंापंे, रहो निर्भय कराहुं नदिया पार  ।।
कोलिहा उंट के पीठ मा सवार, आन्नद उठावें नौका विहार  ।
कोलिहा होइस अति प्रसन्न, तउंरे उंट, कोलिहा गिने लहर  ।।
दूनो संगी पहुंचीस मझधार, बोले उंट मेहा करहुं गोताखोरी  ।
कपटी कोलिहा करय निवेदन, तोर पांव परव करव हाथ जोरी  ।।
पहुंचा दे मोला नदिया ओपार, कर दे मोर गुस्ताखी माफ  ।
लगाहुं डुबकी मेहा मितवा, झइन घबरा कहि देंव साफ  ।।
मुड़ी उठा के बलबल बलबल सन्न पोट होगे कोलिहा के जी  ।
अंाखी आघुमा अंधेरा छागे, हावो शरणागत तोर मरजी  ।।
कोलिहा प्रभु के सुमिरन करे, मंजधार मा उंट डुबकी लगाय   ।
उबुक चुबुक होवय कपटी कोलिहा, जलधारा संग कोलिहा बोहाय  ।।
जइसे करनी वइसने भरनी, करनी के फल मिल के रहिथे  ।
कुकर्म करहुं होही अपयस, संत समाज सब यही कहिथे   ।


माता दरस बर जाबो
25 नवम्बर 2008
धान पान सबांे सकलागे, चलो दीदी घुमंे ला जाबो ओ  ।
मेला मड़ई जाते रहिथन, माता दरस बर जाबो ओ  ।।
डांेगरगढ़ डोगरी मा दीदी, बिराजय पर्वत वासिनी  ।
मता सरग मा रहिथे दीदी, दाई हावय मधुर भासिनी  ।।
लीला अदभुत हावे ओकर, भक्तन दउड़े आथे  ओ  ।
कोई आथे दाई रेंगत रेंगत, कोई घोडत चले आथे ओ  ।।
वहंा सरग निसानी बने हावय, नित जोत जगमगावत हे  ।
दुर देश ले भक्तन ला माता, अपन कोरा मा बुलावत हे  ।।
भंुखे लंाधन भक्तन हा दीदी, भरपेट अधा के जाथे ओ  ।
दुखियारी के कोरा मा दीदी, सुुंदर फुल मुस्काते ओ  ।।
मयारु माता के अंगना मा दीदी, रहिथे सदा बसंत ओ ।
राजा अउ रंक सबो जावे, होवय दंुख के अंत ओ  ।।
पापन के हरन करथे, पुण्य प्रताप देवे माता   ।
भाव के भुखे हावय माता, भक्तन के वरदाता ओ  ।।
अब्बड़ मयारु हावय माता, हरण करे करलई ओ  ।
चलो बहिनी जाबोन दीदी, दरस करे बर बमलाई ओ  ।।

माता के लाज
30 नवम्बर 2008
आओ बच्चों तोला पढाबोन हिसटरी हिन्दुस्तान के  ।
लापरवाही इंहा भरंे पड़े हे देखय जनता हिन्दुस्तान के  ।।
उत्तर मा हावय हिमालय पर्वत, हमला होइस धोखा जबरा  ।
पंचशील के करे समझौता, अपने थुक चाटीस चीनी लबरा  ।।
हिमालय करही हमर रक्षा, अइसन धोखा हमला होइस  ।
चीनी सेना चढ़गे डोगर मा, दनादन गोला बरसाइस  ।।
सुन बासठ के खूनी कहानी, चीनी हमला सबक बताइस  ।
तभोक ले हमहा नइ चेतेन, हमर मगज ला मुरचा खाइस  ।।
भारत भूंइया मा होथे लड़ाई, पाकिसतान हा अंाखी दिखलाथे  ।
संगवारी मन ला मिलते असला, पाकिसतान हा हमला बिजराथे  ।।
सन् पैंसठ के बछछर मा, दुसमन करिस फिर हमला  ।
वीर बहादूर सेना भारत के सबक सिखाइस पाक ला  ।।
र्क्षि विज्ञान मा तरक्की होवय, पाकिसतान के आंखी फुटगे  ।
सन् इकहत्तर के लड़ई मा दुश्मन के एक ठो डेना टूटगंे  ।।
सैन्य बल हा कड़ाहा होगे, कपट निति के धरीस सहारा  ।
मेड़ पार मा रुंधना नइये, खेत मा घुसय हरहा गरवा  ।।
खेत रखवार ला उंघासी लागे, जागे तब ठठावय तरवा  ।
खाय के बेरा सूते ला जावे, सुत उठ के घुघरी मंागय  ।।
बेरा कुबेरा संगी कुछ नी जानथे, उंघरा ला सरम नी लागय  ।
आजु बाजू मा समंूदर हावे, डोगा बइठ के दुश्मन आते  ।।
अफसर मन अफसरी दिखावे, हिही भकभक मा रमावे मन  ।
परदेशी नाविक भारत आइस, लुटेरा मन बर रद्दा बनाइस  ।।
सोन चिरइया कहंा उड़ागे, तखते ताउस कहंा समाइस  ।
सांमती करम हावय हमर, आघु पाठ अउ पीछु सपाठ  ।।
घर द्वार के नइये चिंता, उघरा खिड़की उघरा कपाट  ।
पहुना बन के आथे दुश्मन, रहिथे उंकर साही ठाठ बंाठ  ।।
हियाव करइया कोनो नइये, निरभय होके चलते बंाट  ।
चोर डैकेत अउ अंातकवादी, बैरी खुबेच लाहो लेवत हे  ।।
कानून बेवसथा ला धता बतावे, निरीह जनता ला पेरत हे  ।
फिरका परसती हावय इंहा, गायेच गाय हा धनावत हे  ।।
अपन सुवारथ मा डुबंे लोगन, जनहित ला नी पहचानत हे  ।
हिंदु मुसलिम सिख इसाई, रहिथे सब मिल के भाई-भाई  ।।
अंखफंूटटा ला एक नी सुहावय, करवाथे घर में खुबेंच लड़ाई  ।
सरग मा रहिथे पुरखा मन, देखे कइसे होवय मनमानी  ।।
गंाधी के सपना, सपना होगे, देखो हिन्दुसतान के कहानी  ।
हावे सत्ता सुख के चाह सबो ला, रिझावत हे डालर धन लोभी ला  ।।
माया नगरी के माया मा डुबे, नाचे गावय मड़ावय मन ला  ।
दुष्ट्् अंातकवादी आगे अंदर, शोभा खो दिस भारत के ताज  ।।
रक्षा करइया खटिया मा सुते, कमंाडो बचाय माता के लाज  ।


मकर संक्राति
14 जनवरी 2009

तोर कोरा मा सब आथे माता, तोर अंछरा के लहरा पाथे ओ  ।
हर-हर गंगैे पुण्य सलिला, श्रद्धा भक्ति सुमन चढ़ाथंे ओ  ।।
भारत देश के पावन धरती, रिसी मुनी सब गुन गाथे ओ  ।
सरग ले उतर के आथस ओ माता, भक्थन खुब सहुराथे ओ  ।।
महाप्रतापी कपिल मुनि जानों, कमंडल अपरमपार हे दाई  ।
गंगा सागर मा बिराजे मुनि श्री, ओकर महिमा बरनय न जाई  ।।
मकर संक्राति मा दर्शन होथे, भक्थन उमड़े चले आथे ओ  ।
तोर अंछरा लहरावत रहिथे, ममता मया के सुख पाथें ओ  ।।
लइका सियान अउ दाई माई, खोड़वा लंगड़ा सबो झन आथे  ।
तोर मया हा खीचत रहिथे, अंखियन ले अंतस सुख पाथे  ।।
रात चंादनी जगमग-जगमग दिवा जन सैलाब लहरावे  ।
मन मंदीर मा गंगा सागर, तन-बदन ला खुब बहलावे  ।।
लहर-लहर लहरावय गंगा, सरसर-सरसर चले पवन  ।
गंगा दरशन बर आवे सुरगन, सुन्ना होवय चौदहवों भुवन  ।।
भंाति-भंाति रुप धारण करे, देवता मन इठलावत फिरय  ।
जकहा भुतहा के बाना धरे, भक्तन संग किजरय फिरय  ।।
साधु सन्यासी बन धुनी रमावंे, हरिओम हरिआंेम के होम करे  ।
क्लजुग मा सज्ज्ुाग जस लागे, बघवा संग बकरा भ्रमण करें  ।।
माता-पिता अउ गुरुदेव तीरथ, करथय नर बारम-बार  ।
सबोच के पुण्य प्रताप मिलही, जीवन मा गंगा-सागर एकबार  ।।


चउतरा माइ लोगन
14 जुन 2009
डोकरा डोकरी के दूु झन बेटा, दूनोच बेटा-बहु घर मा रहाय  ।
छोटे-छोटकी रिहिन माइ कमेला, बड़का बेटा महा ओतियाहा रहय  ।।
माई के दिया हावय येहा, कमाय बर अलाली करथे  ।
पर घर ला तुकत रहिथे, अपन ओड़ा ला टेकाय रथें  ।।
एकर ले जादा ओकर घरवाली, थुके-थुक मा बरा रांधते  ।
परोसी घर ला सुंघत रही, अपनेच रंधना ला सूहराथे  ।।
बड़ गोटकारिन हावे येहा, मरवा लमा-लमा के गोठियाते  ।
मुंह बारिन घलोक हावय, परोसिन बर ठेंगा अंटियाथे  ।।
काम बुता मा करही इजगा पारी, सावन भादो खटिया धरी  ।
लकर धकर देवारी मनाही, कातिक महीना मइके जाथंे  ।।
सास ससूर हावे डोकरा-डोकरी, गतर उकर चलय नहीें  ।
दिन अउ रात खिसोड़त रहाय, बिन कहे अढ़िया पचे नहीं  ।।
डोकरा-डोकरी सुनता करिन, तारा जड़ दिन बड़का पेटी मा  ।
बड़ चउतरा बड़े बहु, ताते नहवाय ताते जेवन  ।।
सास-ससुर ला पहिली खिलावे, पाछु करे अपन सेवन  ।
देहें पांव के मालिस करेय, जठना-बिस्तर रोज लगाय  ।।
चिक्कन-चिक्कन खाय बर देवे, कुरिया मा रोज झाड़ू लगाय  ।
कल तक के झगराहिन बहू,खुब करें कलकल-कलकल  ।।
संझा बिहनिया पंाव पलैगी, पंाव पखारे निर्मन जल  ।
बहुरिया रानी सेवा बजाय, डोकरा-डोकरी हावय खुश  ।।
बेटा-बहु मन चरचा करय, दाई-ददा ला रखबोन खुश  ।
पुस-पुनिया के अधरतिया मा, घुघवा करिस धूध्धू तुत  ।।
बहु बेटा के छोड़िन संग, छोड़िन काया होगें पुचभुत  ।
दूनो परानी आके देखिन, डोकरा-डोकरी करा होगंे  ।।
उत्ता-धुर्रा खोलिन पेटी, कथरी गोदरी भरे रहाय  ।
हाथ मलय अउ सिर धुनय, तकदीर ला रोवत रहाय  ।।  

रतन बेटा
30 जून 2009
रतन जोत के रतन बेटा, हावय तोर उजरा जबरा  ।
लुगुर-बुगुर बघरड़ा करय, भुकत हावय कुकुर कबरा  ।।
पेड़ लगिस कोरी खइरखा, पानी फिरगंे होइस डबरा  ।
गाड़ी चलही मोटर चलही, अब कोन ला बनाहूं लबरा  ।।
जो कहिथस वो होवय नहीं हो जथे सब उलटा पुलटा  ।
तोर काम बोलतेच रहय के, गिजगिजावत रहिथे नारी कुलटा  ।।
जरसी गाय के सब रद्दा देखें, छंाद गंेरवा खुंटी में अरोय  ।
देखत-देखत दिन हा पहागे, पीतर खेदा तरीया सरोय  ।।
बिन गाय घर मा बछरू आगें, कइसें होइस चमत्कार  ।
विज्ञानी जन बुझत हावय, अब नइये गउ के दरकार  ।



हबेड़ा खा बोन
01 जुलाई 2001

गंाव मा रहिथंे गरीब किसान, प्राथमिेक  ओला हम देबोन  ।
पानी मिलही बिजली मिलही, सुख सुविधा सबोच देबोन  ।।
तरिया नदिया सबो सुखागे पानी बिन सब तरसत हे  ।
जुड़वारो तिहार घलो मनागे, तभो ले बादर नइ बरसत हे  ।।
हेंडिल टुटगें बोरिंग रूसागे, पानी बिन कण्ठ सूखावत हे  ।
सरी मंझनिया बिजली नइये, बदन पसीना पझरत हे  ।।
नगर शहर मा बिजली रानी, खूबेच मिटमिटावत रहिथे  ।
गांव देहात केे रद्दा भुलागे, ठेंगवा ला दिखावत रहिथे  ।।
दूख दुविधा सुनइया नइये, अब काकर सरन मा जाबोन  ।
सहेब सुदा ए ़सी ़ मा बइठे, नी जानन तो हबेंड़ा खाबोन  ।।

                           

आधुनिक प्रजातंत्र ‘पाप के मटका’ लेखक- श्री मन्नू लाल ठाकुर




13 नवम्बर 2008
सन् पचास के आइस साल, बनिस सविधान भारत के  ।
नागरिक समानता स्वतंत्रता, जनता राज चलाही भारत के  ।।
सामाजिक नियाव के हक मिलही, छोटे बड़ंे के भेद होही खतम  ।
विचार अभि ब्यक्ति सबो करही, राजा नहीं, जनता बनही परम  ।।
प्रशासन होही जनता के सेवक, जनता ला मिलही मान सनमान  ।
बहत हे उलटी गंगा भारत मा, सेवक करे मालिक के हिन भाव  ।।
इंहा जनतंत्र के धज्जियां उड़त हे, गुर्रावय बिलइया गोसइयंा ला  ।
थोरको डर नइये सेवक ला, गोहराय अपन पोसइया ला  ।।
नौकर साही के राज चलत हे, होथे बउपरा जनता के नाम  ।
मालिक हा तो भुइयां मा बईठे, सेवक ला करे झुक-झुक सलाम  ।।
देश भक्ति के नारा खुंटी मा टान्गे, जनसेवा ला कोट मा लटकाय  ।
देख-देख गांधी जी सरमावय, साहब कुरसी मा कुला मटकाय  ।।
करिया दिवाल मा चुना पोतय, अपन मुख मा कोयला रचाय  ।
कुकरी चोर ला सातिर बतावे, देश द्रोही ला गला लिपटाय  ।।
हाथ मा रचावय चुड़ी रंग ला, बजरंग बली मा चढ़े नरिहर  ।
हाथ ला अपन द्यस द्यस के धोवे, कहां ले होही मन हा फरिहर  ।।
मंदीर आघु मा गोल्लर भूकरे, हाट बाजार मा खुरखेद मचाय  ।
दिन अउ रात मेहनत करथय, किसान ला रहिथे हाय-हाय  ।।
देश के धरती सोना उगलय, ये सब काकर भोभस भराय  ।
दिखे मइंद शहर मा रिंगी चिगी, बहीरी हा खुब बजबजावत हे  ।।
छलकावत हे भरे करसा ला, रीता हड़िया ला आधावत हे  ।
गंाधी नेहरु के सपना, सपना होगे मेछरावे करिया बेपारी मन  ।।
इमान धरम के पालन करथे, हाथ मलय वो करमचारी मन  ।
देखत सुनत कान हा पाकगे, खुब हावे इंकर लटका झटका  ।।
सनातन ले चले आवत हे, फूटही एक दिन पाप के मटका  ।

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फिरंगी परिपाटी लेखक- श्री मन्नू लाल ठाकुर



13 नवम्बर 2008  कार्तिक पूर्णिमा

आइस एक झन पुलुस सिपाही, बइठंे रिहिस फटफटी गाड़ी मा  ।
कमावत रिहिन लइका सियान, तरिया तीर के मिरचा बाड़ी मा  ।।
हंाक लगाइस पुलिसिया धुन मा, अरे कमइया सून रे इधर  ।
ए गंाव मा रहिथे नामी चोर, नाम हे ओकर उमकु जंगधर  ।।
कहंा चल दिस नइये घर मा, साले भागे भागे फिरत हावय  ।
लगाहुं लात बरसाहुं डंडा, जेल के हवा जिदगी भर खावय  ।।
केरा पान अस कमइया कांपे, फूटत नइये मुंह ले बक्का  ।
लदलद लदलद गोड  हा कापे, कहा करिस कहा उतारत हे  ।।
कुछ नी जानन हम हा साहब, मन मन खुबंेच धिक्कारत हे  ।
ए परलोखिया ला घमंड हे खुब, वरदी के गरमी गरमावत हे  ।।
बोले के थोरको होस नइये बेसरम हा नी सरमावत हे  ।
घूमत हे खेखर्री कुकुर जस, जगा जग सुसवावत फिरय  ।।
नी जाने थार को लोक बेवहार ला, नीच गंवार पतित नरक गिरय  ।
अइस सुराज सन सैंतालिस मा जगा-जगा तिरंगा फहराइस  ।।
उतरगें थोथना फिरंगी मन के, प्रजातंत्र के पताका लहराइस  ।
बदलगे बंेवस्था शासन के, नी बदलीस फिरंगी परिपाटी   ।।
लुचपत बिन सर न उठावे, सरमावत हे गौतम के माटी  ।
बाबू बोस के पूदगा हा जामगे, थाना अदालत मा रोवय गांधी  ।।
बीबी बच्चा के नाम पर मान्गे, बहत हे रिसवत के आंधी  ।
सरग ले देखे महावीर स्वामी, अहिंसा परमो धरम के हाल  ।।
भक्षण करे मंास मंदिरा के, लबारी बोले होवे मालामाल  ।
संत सिरोमणी गुरु गोविंद सिंह, रद्दा बताइस बलिदान के  ।।,
भगत सिंह करय गरजना तसवीर बदलगे हिंदुस्तान के  ।
छुछु कस छुछवावत हावय बटोरत हावय भूरी चाटी जस  ।।
कलंक के टीका माता के माथा मा, देखे पुरखा होवे असमंजस  ।


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बेटा के मया लेखक- श्री मन्नू लाल ठाकुर



21 अक्टूबर 2010

जेठ महीना के लकलक धाम,  लहुटावत हे छानी के खपरा ।
थपथप थपथप बहे पसीना चिल्लावत हे डोकरा बपुरा ।।
उतर जा बेटा होगें मंझनिया आगे सब बासी खवइया मन  ।
तरवा में सोज बेर हा चमके चलत हे संाझ सन सन सन सन ।।
धाम प्यास ला सोचबोन तो कइसे सरकही धर बूता काम  ।
जाड बसात अउ पानी बरसात लगें रबोन तब होही सब काम  ।।
धु़रुर धावर करत हे जेठ लहुवाथस काबर तेहा मोला  ।
तोर गतर हा चलत नइयें करइया मेंहा संसो हावे तोला  ।।
बगरें हावे अब्बड कंाटा खुंटी सफाई कराबोन खेत खार के  ।
जोरा खूबेच करे बर लागही करबोन बंेवस्था  सब नेत के  ।।
बासी पेज खा के तें छइंहा मा सुत मोला अपन काम ला करन दे  ।
बुदबुदावत हे डोकरा मन मा, अब्बढ़ होथे संतान के ममता  ।।
बेटा चढ़ें सरी मंझनिया छानी मा धकधक तड़पय मोर ममता  ।
कहे बंोले ला बेटा सूनत नइये अपन धुन मा करत हे काम  ।
अंगरी मा सब फफोला परगे उतरे बर नी लेवत हेे नाम  ।।
सोचत हे अइसे येंहा नी माने, नाती ला गोदी मा उठा के लानिस  ।
रोवत हे लइका उसनिंदा मा, टंेहो टंेहो लइका करन लागिस  ।।
आगें डोकरा बिच अंगना मा, कठल कठल के लइका रोवय  ।ं
झंुठ मुठ लइका ला पुचकारय, कहंा लें लइका ला चुप हांेवय ।।
रोवाथस काबर तें लइका ला, बरजत हे बेटा उपर छानी ले  ।
अपन मया तोला पिरावत हे, कइसे चिचयावत हस छानी ले  ।।
रकपिक रकपिक बेटा उतरिस, बेटा ला बेटा कोरा भुरयावत हे  ।
छानी ले बेटा ला उतरत देख, डोकरा के जी अब जुडावत हे  ।।
डतरें के बेरा मा उतरहूं मेहा, एक रददा ला रेगावन दे ।।

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शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

कभी करता मन

कभी करता मन
दुर जन्गल वीरान,
कितना अच्छा होगा
चिडियो की चह्चहाट
कोयल की कुक
और नदियो का कलरव
पानी की सरसरहट
जिसमे ना हो और कोइ आहट

शनिवार, 2 जुलाई 2011

आरंभ Aarambha: छत्‍तीसगढ़ के कुछ और आरूग ब्‍लॉग

आरंभ Aarambha: छत्‍तीसगढ़ के कुछ और आरूग ब्‍लॉग: "सुरेश अग्रहरि छत्‍तीसगढ़ी भाषा भी अब धीरे-धीरे हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में अपने पाव पसार रही है। पिछले पोस्‍ट के बाद रविवार को पुन: छत्‍तीसग..."

आरंभ Aarambha: माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आये फल होय : असमय पका सीताफ...

आरंभ Aarambha: माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आये फल होय : असमय पका सीताफ...: "सुबह-सुबह बंदरों की आवाजों से नींद खुली, मेरी श्रीमती और पुत्र घर से लगे 'कोलाबारी' में बंदरों की टीम को भगाने की कोशिशों में लगे थे। बंदर घ..."